प्रदोष काल व्रत कथा Pradosh Kaal Vrat Katha

Pradosh Kaal Vrat Katha
Pradosh Kaal Vrat Katha

Pradosh Kaal Vrat Katha : प्रदोष काल व्रत जिस भी दिन पड़ता है उसे दिन को प्रदोष काल व्रत कहते है , इस साल का पहला प्रदोष काल व्रत 4 जनवरी दिन बुधवार 2023 को पड़ा है ,,तो सुकल पक्ष को बुध प्रदोष काल व्रत कहा जाता है। बुध प्रदोष
काल व्रत का व्रत जो की सभी कामनाओ को पूरा करने के लिये किया जाता है।

यह व्रत पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है ,प्रदोष काल व्रत Pradosh Kaal Vrat Katha में भगवन शिव और माँ गौरी के साथ उनके पुरे परिवार की पूजा की जाती है ,जो भी मनुष्य सच्ची निष्ठा और नियम के अनुसार यह प्रदोष काल व्रत को करता है, उसके सभी प्रकार के पाप धूल जाते है।

प्रदोष काल व्रत Pradosh Kaal Vrat Katha जो की 100 गायों के दान के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। प्रदोष काल के व्रत में प्रदोष काल का समय जो की सूर्य के उगने से 1 घंटे पहले और सूर्यास्त के समाप्त होने के 1 घंटे बाद का होता है। इस समय भगवान शिव का पूरी विधि – विधान के साथ पूजा करनी चाहिए।

श्री शिव भगवान अति प्रसन होते है ,जो की पुरे दिन उपवास रहकर इस व्रत को करना चाहिए। और जो मनुष्य जिसका स्वस्थ ठीक ने हो वह फल आदि खा के यह व्रत कर सकता है ,

प्रदोष काल की व्रत कथा Pradosh Kaal Vrat Katha


Pradosh Kaal Vrat Katha : बहुत समय पहले की बात है एक बार ऋषियो ने सूत जी से कहा – ” हे ऋषि मुनी हमें प्रदोष काल के व्रत के बारे में बताये तब सूत जी बोले – ” हे ऋषियो में तुम्हे एक कथा सुनाता हूँ जरा ध्यान लगा के सुनना , एक बार की बात है।

एक मनुष्य का नया नया विवाह हुआ था। और विवाह के बाद जब वह अपने ग़र को आ गया था तो कुछ दिन बाद जब विवाह के बाद वह अपनी पत्नी को उसके मायके ले गया जो की गोंना होता है,और वह अपनी पत्नी को उसके घरवालो से मिलाकर वापस अपने नगर को आना चाहता था।

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Pradosh Kaal Vrat Katha : तब उसके ससुरालवालों ने उसे जाने से मना किया , उसके सांस ,ससुर और सालीओ ने भी अपने जीजा जी को जाने से मना किया परन्तु वह नहीं माना और वापस आने की जिद करने लगा। क्योकि उस दिन बुधवार था बुधवार के दिन कही जाते नहीं है। यह अशुभ होता है।

अंत में उसके सांस और ससुर ने बड़े ही भारी मन से उसे विदा किया। और वह दोनों पति और पत्नी बैलगाड़ी में बैठ कर जाने लग और जैसे ही वह नगर से बाहर निकले ,वही कुछ दूरी पर उसकी पत्नी को प्यास लगने लगी ,और उसने अपने पति से कहा – ‘ सुनियै जी मुझे प्यास लगी है। “

और उसका पति एक लौटा ले कर पानी लेने के लिये चला गया ,और जब वह पानी ले कर वापस आया तो उसको बड़ा ही क्रोध आया ,क्योकि उसकी पत्नी किसी और मनुष्य के लौटे से पानी पी रही थी औरर बड़े ही खुशी से हँस – हँस के उस मनुष्य से बात कर रही थी।

और वह उस मानुष से झगड़ा करने लगा ,और वह मनुष्य बड़े ही अस्चर्य में पड़ गया क्योकि उस मनुष्य की सकल उस मनुष्य सी मिलती थी एक ही सकल के दो मनुष्य को आपस में लड़ता देख वहाँ से आने जाने वालो की भीड़ जमा हो गई।

यह सब देख कर वहाँ सिपाही भी आ पहुचे और उस स्त्री से कहा – ” की इन दोनों में से तुम्हारा पति कौन है ?
यह सब देखकर उसकी पत्नी बड़े ही संकट में पड़ गई, और वह बहुत ही दुःखी होने लगी ,अपनी पत्नी को इस तरह देख वह मनुष्य बड़ा ही दुःखी हुआ ,और भगवान श्री शिव से प्राथना करने लगा। मुझे और मेरी पत्नी को इस संकटसे बाहर निकाले।

हे प्रभु मुझसे बड़ी ही भूल हो गई जो की बुधवार के दिन में अपनी पत्नी को विदा करा लाया भविष्य में ऐसा कभी नहीं होगा और फिर भगवान शिव ने उसकी मनोकामना को पूरा कर दिया और वह दूसरा मनुष्य अन्तर्धान हो गया। और वह मनुष्य खुशी – खुशी अपने घर को चला गया।

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इस तरह वह दोनों पति और पत्नी विधि – विधान से भगवान शिव की Pradosh Kaal Vrat Katha प्रदोष काल के व्रत-पूजा करने लगे ,और भगवान भोलेनाथ की कृपा से उनके सभी कस्ट दूरहो गए ,और अमीस्ट सिद्धि की प्राप्ति हुई।

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प्रदोष व्रत की कथा Pradosh Kaal Vrat Katha

बहुत ही गरीब पूजारिण

Pradosh Kaal Vrat Katha : प्राचीन काल में एक बहुत ही गरीब पुजारी रहा करता था । उस गरीब पुजारी की मृत्यु के पछताप के बाद वह रोजआना विधवा पूजारिण अपने परिवार के भरण-पोषण के लिएअपने प्रिय को पुत्र को साथ लेकर भीख मांगती ,और जैसे ही शाम होती वह आपने घर को वापस आ जाती थी।

एक दिन अचानक उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हो गई , जो कि राजा की मृत्यु के मृत्यु के बाद यहाँ -वहाँ दर-दर भटक रहा था । उस राजकुमार की यह दुर्दशा देखकर वह गरीब पुजारी की पत्नी से देखी नहीं गई, और वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई औरउसके साथ अपने पुत्र के समान ही रखने लगी।

एक दिन गरीब पुजारिण अपने दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई। वहां आश्रम में उसने महान ऋषि से भगवान् शिव जी के प्रदोष काल व्रत की कथा के बारे में सुना और बड़े ही ध्यान से उनकी यह कथा सुनी और अपने घर जाकर , पुजारिण यह प्रदोष काल व्रत बड़े ही विधि – विधान के साथ करने लगी।

एक समय वह दोनों बालकपास के वन में घूम रहे थे। उनमें से पुजारिण का बेटा तोअपन घर को लौट आया , लेकिन राजा का बेटा राजकुमार वन में ही रह गया। उस राजा के बेटे ने जब गंधर्व कन्याओं को वन में क्रीड़ा करते हुए देखा, तो वह उन कन्याओ से बात करने लगा। उस सुन्दर कन्या का नाम अंशुमती था। उस दिन वह राजा का बेटा अपने घर देर से लौटा।

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राजा का बेटा दूसरे दिन फिर से उसी वन में उसी जगह पहुंचा, जहां अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी। अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया और उस राजकुमार से कहा – ” आप तो विदर्भ नगर के राज्य के राजकुमार हो ,और आपका शुभ नाम धर्मगुप्त है।

अंशुमती के माता-पिता को राजा का बेटा राजकुमार बहुत ही पसंद आया और उन्होंने उस से कहा – ” कि भगवान शिव जी की कृपा से हम अपनी प्यारी पुत्री का विवाह आप से करने के इच्छुक है, क्या आप यह विवाह करने
के लिए तैयार हैं ?

तब राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दे, दी तो उसके माता – पिता ने वह विवाह बड़े ही रीति – रिवाज के साथ संपन्न कराया । उसके बाद में राजकुमार ने गंधर्व की विशाल सेना को अपने साथ ले कर विदर्भ पर हमला कर दिया , और इस घमासान युद्ध के बाद राजकुमार ने विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगा।

वहां उस महल में वह पुजारिण और उसके पुत्र को आदर के साथ महल ले आया, और अपने साथमहल में रखने लगा। वह गरीब पुजारिण और उसके पुत्र के सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई ,औरवह सभी सुख से अपना जीवन यापन व्यतीत करने लगे।

एक दिनकी बात है। अंशुमती ने अपने पति राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे की वजह पूछी और इसका रहस्य पूछा, तब राजकुमार ने अपनी पत्नी अंशुमती को अपने जीवन की पूरी कहानी बताई और साथ ही प्रदोष काल व्रत की कथा और उसका महत्व और व्रत से प्राप्त फल से
भी अवगत कराया।

उसी दिन से प्रदोष व्रत की कथा Pradosh Kaal Vrat Katha और प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया ,सारे संसार में बढ़ गया.
और मान्यतानुसार सभी लोग यह प्रदोष व्रत की कथा और व्रत करने लगे। कई जगहों पर अपनी श्रद्धा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों ही मिलकार यह प्रदोष व्रत करते हैं।ऐसा कहा जाता है की इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी कष्ट और पाप नष्ट होते हैं। और सभी मनुष्यो को अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

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