श्री सत्यनारायण की व्रत कथा  |  Shree Satyanarayan Vrat Katha

Satyanarayan Vrat Katha : हैलो भक्तों आज हम आपको बताने जा रहे है श्री सत्यनारायण की कथा के बारे में जो की बहुत ही लॉकपिर्य और भारतीय हिन्दू धर्म के अनुसार कही गई है और आपको अच्छी लगेगी यह कथा श्री सत्यनारायण जी की है आप लोगो को यह कथा बहुत ही पसन्द आएगी तो चले शुरू करते है।

Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण की व्रत कथा

अधाय्य पहलाSatyanarayan Vrat Katha

एक समय की बात है की ऋषि व्यास जी महराज जी बोले – नेमि सायाण तीर्थ स्थान में सौम्य कारी 88 ,000 ऋषि मुनि पुराण वेदा ऋषि से पूछने लगे , हे ऋषि जिस व्रत अथवा तप से हमको अमीस्ट फल प्राप्त हो सके।

उसको हमारी सुने की अभिलाषा है ,आप हमसे कहने की कृपा करे श्री व्यास जी बोले – एक समय में यही सवाल ऋषि मुनि नारद जी ने भगवान लुक्ष्मी पति विष्णु जी से पूछा था।

भगवान विष्णु जी ने जिस प्रकार नारद जी से कहा था। उसे तुम मन लगाकर सुनो ,एक समय नारद जी दूसरो की भलाई करने के माध्य्म से एक लोक से दूसरे लोक में घूमते घूमते मर्त्य लोक में आ गये।

यहाँ आकर अनेक योनियों में उत्पन हुए मनुष्यो को देख कर तरह – तरह के क्लेशो और दुःखों को देखकर नारद जी ने सोचा की इन प्राणियों का दुःख किस प्रकार दूर हो ,ऐसा मन में विचार कर विष्णु जी के स्वर्ग लोक में चले गए।

वहाँ स्वेत वर्ण ,चुतर भुज ,संख ,चक्र ,गदा और अनेक मालाओं से सुशोभित हुए देवो के देव भगवान विष्णु जी को देख उनकी सुरति करने लगे श्री विष्णु भगवान नारद जी को वहाँ देख कर बोले – ” हे नारद आपके यहाँ आने का क्या उदेस्य है ?

और तुम्हारे मन में क्या है ? हे मुनि यह सब तुम मुझे से कहो – में उस सब का उतर दूगा , नारद जी बोले – ” हे भगवन ,मर्त्य लोक में मनुष्य अलग – अलग योनियों में उत्पन अपने अपने कर्मो और पापों से दुःखी है।

अतः यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो ,बताये उनका यह दुःख किस प्रकार से दूर हो सकता है। श्री विष्णु भगवान जी ने कहा – हे पुत्र ,तुमने संसार के ऊपर कृपा करने की बड़ी ही उत्तम बात पूछी है। “

जिस प्रकार से प्राणी मोह माया से दूर हो जाते है ,उसे तुम धयान से सुनो , स्वर्ग अवं मर्त्य लोक में फल देने वाला एक बड़ा ही उत्तम व्रत है। तुम्हारे कहने से में उस व्रत को बताता हूँ।

श्री सत्यनाराण के व्रत को भली – भाती करने से मनुष्य परलोक में मोक्ष को प्राप्त होता है , श्री विष्णु जी की बात को सुनकर नारद जी बोले – हे भगवन। उस व्रत को करने की क्या कथा और फल है ?

एवं उस व्रत को किस – किस ने क्या है ? तथा वह व्रत किस दिन करना चाहिए। यह सब विस्तार से करने की कृपा करे ,श्री भगवान जी बोले – यह व्रत दुःख और शोक को शांत करने के लिए किया जाता है।

धन और धाय को बढ़ाने वाला और संतान और सोभाग्य को बढ़ाने वाला है। और जिस दिन मनुष्य भक्ति ,सरधा से मुक्त हो औरशांत हो ,उस दिन सांध्य काल के समय श्री सत्यनाराण की पूजा करे।

भरमाण और ऋषियों के साथ घर में रहे और मिठाई ,केले के पके फल एवम घी ,दूध ,गेहू का आटा या चावल का आटा ,गुड़ या सकर ले के भक्ति भावना से अपने सगी समधी के साथ पूजा करे औरभरमाण को दक्षणा देने अपने
बंधू और बान्धव को भोजन कराये , और बाद में खुद भक्ति भावना से प्रसाद को ग्रहण करे।

और हर व्यक्ति भक्ति भावना से अपने अपने घर को चले जाये। इस व्रत का आचरण करे से मनुष्य के सभी कस्ट दूर हो जाते है। विशेष रूप से कलयुग में यही एक छोटा उपाय है।

सूत जी बोले हे बर्ह्माण इसके बाद जिस ने यह कथा कही है उस को कहता हूँ। बोलो सत्यनाराण जी की जय

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अधाय्य दूसराSatyanarayan Vrat Katha

काशी में रामू ब्राह्मण की कथा

काशी पूर एक सुन्दर नगरी में एक बहुत ही निर्धन रामू ब्राह्मण नाम का मनुष्य रहता था। वो ब्राह्मण भूख और पियास से दुःखी रोज पृथ्वी के ऊपर ही रहता था ,भगवान से जियादा प्यार करे वाले ब्राह्मणो ने उसे इस प्रकार दुःखी देख स्वम एक ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे पूछने लगे –

हे ब्राह्मण- “तुम अत्यंत ही पृथ्वी पर दुःखी हो ,नित्य क्यों फिरते हो ?
हे ब्राह्मणो – समस्त कारण मेरी सुने की इच्छा है। ब्राह्मण बोला – हे प्रभु में बहुत निर्धन ब्राह्मण हूँ।

भिक्षा के लिए इस पृथ्वी पर गम रहा हूँ। हे प्रभु – यदि आप मेरी इस निर्धनता का कोई उपाय आप जानते है मुझे अवश्य कहे , वेष धारण कर प्रभु बोले हे ब्राह्मण एक है जो तुम्हारी सभी मनोकामना पूरी कर सकता है।

श्री सत्यनाराण की कथा एवं व्रत – हे ब्राह्मण उन्ही व्रत एवं पूजा करो। जिस व्रत को करने से मनुष्य सभी कस्टो से दूर हो जाता है। उस सम्पूर्ण व्रत की सारी विधि बताकर ,श्री सत्यनाराण वही धन्य धान हो गए।

वृद्ध ब्राह्मण मुझ यह अवश्य करूगा ,उस प्रभु की बात सुनकर उस ब्राह्मण रात नींद नहीं आई ,और वह ब्राह्मण करुँगा यह सकल्प कर ,भिक्षा मांगने लिये जाता है।

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और दिन रामू ब्राह्मण को बहुत से धन की प्राप्ति गई ,और उस दिन ब्राह्मण अप्पने बंधू – बान्धव के साथ मिलकार यह व्रत किया। इस व्रत के मद्धम से सभी दुखो से मुक्त हो गया। और सम्पूर्ण सम्पति से धान्य हो गया और वह हर महीने श्री सत्यनाराण के व्रत करने लगा।

उसी दिन वह रामू ब्राह्मण श्री सत्यनारायण की पूजा और व्रत से सभी दुःखो से मुक्त हो गया मोक्ष को प्राप्त हुआ ,और सभी ब्राह्मणो सर्वसिष्ठ हो गया

श्री सत्यनारायण की कथा और व्रत जब भी कोई मनुष्य पृथ्वी पर करता है। तो उसी समय उस मनुष्य पापो नाश हो जाता है , और वह सभी दुःखो से मुक्त है और मोक्ष प्राप्त होता।

लकड़हारा की कहानीSatyanarayan Vrat Katha

इसी प्रकार नारद भगवान विष्णु जी से कहा – ” हे नारद मुनि मेने ये वरदान तुम्हे क्यों बताया ? ” और क्या वर्णन करू , हे प्रभु पृथ्वी पर यह व्रत किस – किस ने क्या ?

वो हमारी सुनने इच्छा है , फिर जिस – जिस व्रत किया है , एक दिन वही रामू ब्रह्मण अपने बंधु बान्धव साथ पृथ्वी पर श्री सत्यनाराण की पूजा और व्रत करने था। फिर वही एक लकड़हारा रामू ब्रह्मण पूजा करते देख ,

वही श्री सत्यनारायण की कथा सुनने को गया वह भूखा और प्यास वियाकुल था ,और बैठ भगवान भजन कीर्तन करने लगा ,और सम्पन बाद लकड़हारा उस ब्रह्मण बोला – हे ब्रह्मणआप क्या थे ?

ब्रह्मण ने सारी बात उस लकड़हारे दी कहा – व्रत को करने से सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है

उस ब्रामण की बात को सुन कर लकड़हारे ने प्रासद ग्रहण कर , नगर चला फिर जाते समय लकड़हारा अपने मन ऐसा सोचने लगा गांव में जो लकड़ी बेच पैसा आएगा उस से श्री सत्यनारायण पूजा व्रत करुगा।

फिर वह एक ऐसे सुन्दर नगर में जहाँ बहुत ही धनी रहते थे,वहाँ से बहुत ही दुगना धन प्राप्त हुआ , वहाँ से लौटते समय पके केले के फल ,गेहू का आटा , चावल का आटा ,घी ,दूध ,गुड़ ,सकर आदि इकठा कर अपने घर को गया और अपने बन्धु – बान्धव के साथ मिलकर पूरी विधि विधान साथ उसने श्री सत्यनाराण का व्रत किया।

धन और पुत्र को पाकर इस संसार में लकड़हारा मोक्ष को प्राप्त हुआ ,

तीसरा अध्यायSatyanarayan Vrat Katha

साधू वेश और उसकी पत्नी

सूत जी बोले – हे सभी मुनियो अब आगे की कथा सुनाता हूँ। पहले के समय में एक राजा का राज्य था वह राजा बहुत ही बुद्धिमान ,सत्यवादी और परोपकारी राजा था। प्रति दिन अलग अलग स्थानों पर जाता तथा गरीबो को धन देकर उनके सभी कस्ट दूर करता था।

उस राजा की पत्नी कमल के समान मुख वाली और सती सावत्री थी उनके कोई पत्र नहीं था तथा पुत्र प्राप्ति के ले भद्रशीला नामक नदी के किनारे तट पर राजा और रानी ने श्री सत्यनाराण का व्रत किया।

उस समय वहाँ एक साधू वेश धारण कर आया उसके पास व्यापार के लिये बहुत ही सारा धन था , वह नाव को किनारे लगा कर राजा आया और राजा को व्रत करते देख बड़ी ही विन्रमता से पूछने लगा – हे राजन आप यह भक्ति भावना से आप क्या कर रहे है ?

मेरी यह सुनने की इच्छा है कृपा आप मुझे यह बतायें। राजा बोलै – हे साधू वेश में यह भगवान श्री सत्यनारायण जी का व्रत और कथा अपने सभी बन्धु और बान्धव के साथ मिलकर पुत्र प्राप्ति के लिए यह व्रत कर रहा हूँ।

राजा सुनकर वह साधू बोला – हे राजन मुझे भी यह व्रत पुरे विद्वान के साथ बताओ में भी आपके विधान के अनुसार इस सत्यनाराण के व्रत करुगा , मेरे कोई संतान नहीं है मुझे विस्वाश है।

इस व्रत के करने से निष्चय ही हमें सन्तान की प्राप्ति होगी और राजा से सारी बात पूछ कर वह वहाँ से ख़ुशी – खुशी चला गया , साधु वेश ने अपनी पत्नी को सारी बात बताई और प्रण किया की जब मेरे कोई सन्तान होगी तब में यह व्रत करुगा

साधु ने अपनी पति से यह शब्द कहे।और कुछ समय बाद साधू की पत्नी गर्भपती हो गई तथा नौवे महीने में उसके घर एक कन्या ने जन्म लिया। और दिन पे दिन वह जल्दी बड़ी होने लगी और उस कन्या का नाम कलावती रखा गया था

फिर साधू की पत्नी ने अपने पति से कहा – ” की आप ने जो श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत को करने का मन में सकल्प किया था अब करिये साधू बोला – ” हे मेरी प्रिय इसके विवाह पर करुगा और अपनी पत्नी को आश्वासन दे कर नगर को चला गया।

कलावती को पितृ ग्रह मर वृद्धी प्राप्त हो गई। साधू कलावती को अपनी सखियों के साथ नगर में देखा तो तुरंत दूत को बुलाकर कहा – ” की अपनी पुत्री के लिए कोई और सयोग वर देख लो।

साधू की बात मानकर दूत कंचन नगर चल दिया ,और वहाँ पर बड़ी ही खोज बीन साथ ,देख परख कर एक सयोग्य वर को ले आया ,उस सयोग्य वर को साधू देख कर अपने सभी बन्धु – बान्धव के साथ बढ़ी ही

के साथ बड़ी ही खुशी के पुत्री का विवाह उसके साथ किया। किन्तु विवाह के बाद भी श्री सत्यनाराण के व्रत को करना भूल गया। तब श्री सत्यनारायण क्रोधित हो गये।

और साधू को शार्प दिया की तुम्हे दारुण दुःख प्राप्त हो ,अपने सभी कार्यो से मुक्त हो कर अपने जमाता के साथ समुंदर समीप स्थित एक रतनपुर नगर में गया।

जो की राजा चन्द्रकेतु का राज्य था और दोनों वहाँ काम करने लगे। एक दिन श्री सत्यनारायण की मदद से एक चोर राजा के यहाँ चोरी कर भाग रहा था तो राजा के सैनिको ने उस चोर का पीछा किया तो उस चोर ने राजा का धन एक जगह रख दिया जहाँ साधू और उसका दामात काम कर रहा था।

धन को वहाँ देख सिपाहियों ने साधू और उसके दामात को बंधी बना लिया और राजा के पास ले आये ,और राजा से कहा – इन दोनों चोरो को हमने पकड़ लिया है अब आगे की कारवाही करने का हुकम दे।

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राजा की आज्ञा से उन दोनों को काल कोठरी में डाल दिया गया और उनसे उनका सारा धन छीन लिया गया श्री सत्यनारायण के शार्प से साधू की पत्नी भी बहुत ही दुःखी रहने लगाी।

और साधू के घर में जो भी धन रखा था उसे भी चोर चुरा के ले गये घर में खाने के लिए भी अन्न का दाना नहीं रहा और साधू की पत्नी और बेटी कलावती दोनों भूख और प्यास से व्याकुल हो गई।

वो दोनों नगर में भिक्षा मांगने के लिए मजबूर हो गई और एक दिन जब कलावती नगर में घूम रही थी तब उसने एक ब्रह्मण के घर में श्री सत्यनारायण की पूजा को देख कर वही बैठ गई और शाम को कथा सुनने के बाद प्रसाद ग्रहण कर वहाँ से घर वापस आ गई। .

और जब कलावती की माँ ने उस से पूछा – तो उसने श्री सत्यनारायण के व्रत और कथा के बारे में अपनी माँ को बता दिया और अगले दिन साधू की पत्नी और बेटी कलावती ने श्री सत्यनारायण के व्रत और कथा की तैयारी शुरू कर दी।

और अपने सभी बन्धु और बान्धव के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण की पूजा और पाठ किया और श्री सत्यनाराण जी उनकी पूजा से प्रसन हो कर कहा की क्या वर मांगते हो तब साधू की पत्नी ने अपने पति और दामात को घर आने के लिए कहा।

और श्री सत्यनारायण जी अपने अपराध के लिए छमा मांगी और अगले दिन राजा के सपने में जाकर राजा जी से कहा – ” हे राजन तुम उन दोनों साधू और उसके दामात को छोड़ दो और उनका सारा धन उन को वापस कर दो । ” अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो में तुम्हारा राज्य और सभी धन को नस्ट कर दूगा।

राजा को यह सब कह कर वह अंतर्धान हो गए। अगले दिन सुबह को राजा ने भरी सभा में उन दोनों को बुलाया और उन दोनों ने एते ही राजा को प्रणाम किया राजा ने कहा – हे साधु तुम दोनों के जो सारे कस्ट थे अब मिट गए है और अब आप मुक्त हो अपने नगर को जा सकते हो।

और संसार के सभी सुख भोगने लगे और बाद में मोक्ष को प्राप्त हुए ,

चौथा अध्यायSatyanarayan Vrat Katha

सूत जी बोले -साधू वैश्य ने अपनी यात्रा शरू कर ,और अपने नगर की और चल दिया , उसे थोड़ी दूर चलते ही एक दण्डी वैश्धारी श्री सत्यनारायण जी मिले और नाराणय जी ने पूछा – हे साधू तेरी नाव में क्या है ?

अभिमानी व्यक्ति हसता हुआ बोला – हे दण्डी आप क्यों पूछ रहे हो ? क्या धन लेने की इच्छा है। मेरी नाव में तो बेल व पत्ते भरे हुए है। वैश्य के कठोर वचन सून भगवान बोले – तेरी बात सत्य हो और वहाँ से चले गए और नदी के किनारे जाकर बैठ गए।

उस वेशधारी के जाने के बाद उस साधू ने रोज की तरह अपना कार्य शुरू कर दिया। और नाव लो ऊपर उठता देख अचम्भा माना और नाव में बेल और पत्ते देख वह बेहोश हो गया।

होश के बाद वह शोक में डूब गया ,फिर उसके दामात बोला – ” की औ शोक ना मनाये ये उस दण्डी का सार्प है। ” इस्लिये हमें उनकी सरण में जाना चाहिये।

दामात हमारी मनोकामना पूरी होगी। साधू दामाद की बात को मानकर उस दण्डी के पास गया और बोला – हे मेने आप भी कठोर वचन कहे है ,उसके लिए मुझे छमा दे और वह जोर – जोर से रोने लगा।

तभी दण्डी भगवान बोले – ” हे साधू पुत्र की मेरी आज्ञा से तुम्हे बार – बार दुःख भोगना पड़ा की आज तू मेरी पूजा से विमुख हुआ। ” साधू बोला – हे भगवन आपकी माया को देवता भी नहीं जानते तो में अज्ञानी कैसे जानू। “

आप प्रसन होइये में बड़ी ही भक्ति भावना से आपका व्रत और पूजा करुगा ,आप मेरी रक्षा करो और पहले के समान मेरी नौका में धन भर दो। साधु वैश्य के भक्ति भाव को देखकर श्री सत्यनाराण जी उसको उसकी इच्छा के अनुसार फल देकर अन्तर्धान हो गए।

ससुर और दामात जब नाव से घर की और रहे थे तो रास्ते में ही अपने सगे – सम्बन्धी के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण जी की बड़े ही भक्ति भाव से पूजा अर्चना कर के घर की और आये तो रास्ते में ही अपने दूत को देख घर पर खबर दे दी।

दूत घर जाकर साधू की पत्नी को प्रणाम करते हुए कहता है – की मालिक अपने दामात के साथ घर के निकट आ गए है दूत सुनकर साधू पत्नी और बेटी कलावती ने बड़े ही मन के साथ श्री सत्यनारायण की पूजा करने लगी।

और कलावती ने कहा – में अपने पति के दरसन को जाती हूँ।तुम कार्य कर के जल्दी आ जाना और प्रसाद ग्रहण करे बिना ही चली जाती है। इस तरह प्रसाद को छोड़कर जाने पर श्री सत्यनारायण भगवान रुस्ट हो जाते है।

और जब वह वहाँ आती है , तो उसके पति उसे नहीं मिलते है क्योकि भगवान श्री सत्यनारायण ने उसके पति की नाव को पानी में डूबा दिया था। और वह जोर – जोर से रोने लगती है तब अपनी बेटी को रोता देख ,साधू बोला हे भगवन मुझसे ऐसी क्या भूल हुई है ?

तब एक ऐसी आकाशवाणी हुई की तुम्हारी बेटी मेरा प्रसाद ग्रहण करे बिना ही आ गई है। अगर वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण कर ले तो उसका पति वापस आ जायेगा।

यह सब बात सुनकर वह घर को वापस गई और प्रसाद ग्रहण किया। फिर वापस आ के पति के दरसन करती है इसके बाद साधू अपने बन्धु और बान्धव साथ मिलकर बड़ी ही भक्ति भाव से श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करते है।

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और इस तरह वह संसार सुख भोग के अंत में स्वर्ग को जाता है।

पाँचवा अध्याय Satyanarayan Vrat Katha

सूत जी बोले – हे ऋषिमुनियों में एक और बात बताता हूँ जरा ध्यान लगा कर सुनना प्रजा पाल में लीनध्वज नाम का राजा राज्य करता था। उसने भी भगवान श्री सत्यनारायण के प्रसाद को त्याग कर के इस संसार में बहुत ही दुःख भोग रहा था।

एक बार जगल में वह अन्य कई जानवरो मार के एक बड़ के पेड़ के नीचे आकर बैठ गया और वहा उसने अपने ग्वाले को बड़ी ही भक्ति भाव से श्री सत्यनारायण जी की पूजा करते देखा।

अभिमान से भरा राजा उन्हें वहाँ पूजा करते देखकर भी नहीं गया और ना ही उसने भगवान को प्रणाम किया। ग्वालो राजा को प्रसाद दिया मगर राजा ने उसे भी नहीं खाया।

और प्रसाद को वही छोड़ अपने नगर को चला गया , जब राजा अपने नगर में गया तो वहाँ उसने सभी तहस नहश पाया ,और वह जल्दी ही समझ गया की भगवान ने किया है। और दोबारा ग्वालो के पास गया और माफ़ी मांगी और प्रसाद ग्रहण किया।

और सत्यनारायण कृपा से सब कुछ पहले जैशा हो गया और अपनी प्रजा साथ सुखी सुखी रहने लगा और दीर्घकाल तक सुख भोगने लगा और अंत में मोक्ष को प्राप्त हुआ।

जो भी मनुष्य इस व्रत को बड़ी भक्ति भाव करता हैउसे श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से सभी मनोकामना पूरी हो जाती है और वह संसार के सभी सुख भोगता है और धन – धान से घर भर जाता है और अंत में वैकुन्डधाम को जाता है।

सूत जी बोले – जिस – जिस ने इस व्रत को किया है ,अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूँ , वर्द्ध रामू ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष प्रप्ति की , लकड़हारे निसाद बनकर मोक्ष प्राप्ति की , उल्कामुख नाम का राजा दशरत बनकर मोक्ष प्राप्ति की। साधू नाम के वेसी मोरध्वज बनकर मोक्ष पाया और राजा दुग्ध्वज ने भक्तिभावना से मोक्ष पाया ,और तरह यह कहानी समाप्त होती है

आरती श्री सत्यनारायण भगवान जी की

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा ॥ जय लक्ष्मी… ॥

रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे ।
नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे ॥ जय लक्ष्मी… ॥

प्रकट भए कलि कारण, द्विज को दरस दियो ।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल जय लक्ष्मी….. ॥

दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी ।
चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी बिपति हरी ॥ जय लक्ष्मी… ॥

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं ।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, .फिर स्तुति किन्हीं ॥ जय लक्ष्मी… ॥

भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्‌यो ।
श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सरो ॥ जय लक्ष्मी… ॥

ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी ।
मनवांछित फल दीन्हा , दीन दयालु हरि ॥ जय लक्ष्मी… ॥

चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा ।
धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ जय लक्ष्मी… ॥

सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे ।
तन-मन-सुख-संपति मनवांछित फलपावे ॥ जय लक्ष्मी… ॥

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बार बार पूछे जाने वाले सवाल :

यह व्रत किस दिन किया जाता है ?

यह व्रत बृहस्पतिवार के दिन को किया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु का बहुत ही प्रिय है ,और उनका दिन बृहस्पतिवार ही होता है। और उस दिन श्री सत्यनाराण का बड़ा ही शुभ दिन होता है, और उस दिन भगवान विष्णु जी को पीले वस्त्र बहुत ही प्रिय होते है।

श्री सत्यनारायण के व्रत में क्या खाना चाहिए ?

श्री सत्यनारायण के व्रत में हम फल सभी प्रकार के खा सकते है। जैसे की सेब ,संतरा ,चीकू, अनार ,अमरूद ,आम आदि। और हम आलू ,सकरगन्द ,दूध ,दही ,और मिठाई भी खा सकते है। सभी मेवे जैसे बादाम ,काजू , किसमिस ,गोला ,मूगफली के दाने आदि खा सकते है।

क्या नहीं खाना चाहिए ?

हमें श्री सत्यनारायण के व्रत में केले बिलकुल भी नहीं खाने चाहिए क्योकि हम श्री सत्यनाराण की पूजा में केले के पेड़ की पूजा करते है। तथा नमक का इस्तेमाल भी न करें।

पूजा विधि :

श्री सत्यनारायण की पूजा हम किसी भी महीने की पूर्णिमा से शुरू कर सकते है , ऐसा माना जाता है की श्री सत्यनारायण का दूसरा रूप भगवान विष्णु जी का ही रूप ही है। और उस दिन से हम यह व्रत कर सकते है।

उस दिन बृहस्पतिवार को सुबह नहा धोकर एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछा कर भगवान श्री सत्यनाराण की मूर्ति को रख देना और थोड़े से चावल लेकर चौकी पर चावल से सुवस्तिक बना दे और एक लोटे में कलश में पानी भर के उस थोड़े से चावल ,हल्दी ,एक सिका और थोड़ा सा गगाजल डाल दे ,आम के पत्ते लौटे में लगा दे। ऊपर एक नारियल को रख दे और केले का छोटा सा पेड़ रख दे और सामग्री आदि जैसे की – अगरबत्ती , धूपबत्ती , घी गुड़ या सकर चने के दाने ,पिले फूलो की माला , और तुलसी के पत्ते भी ले ये श्री सत्यनारायण जी अति ही प्रिय होते है।

और गेहू का आटा या चावल का आटा , दूध, दही , हल्दी ,कलावा ,चने की दाल , और पीले फल आदि को रख कर अपने बन्धु बान्धव के साथ शाम के समय में पूजा करनी चाहिए। अगर आप चाहे तो पंडित को बुला कर पूजा करा सकते है।

अगर सम्भव ना हो तो आप खुद भी यह कथा पढ़ सकते है। और कथा के बाद प्रसाद को सभी को दे कर बाद में खुद ग्रहण करे। पीले वस्त्र ही पहने अगर सम्भव है तो। और अपने मन में जय श्री सत्यनाराण का जाप भी करते रहे जय श्री सत्यनाराण।जय श्री सत्यनाराण।

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