Vaishno Devi Story । माता वैष्णो देवी की कथा

Vaishno Devi Story
Vaishno Devi Story (Image : Credit)

Vaishno Devi Story : जैसा  की माना जाता है।  की माता रानी को आदिशक्ति  के रूप में भी जाना  जाता है । जब धर्म पर अधरम की विजय होने लगे तब माता रानी ने दुनिया में जनम लिया है । जब चारो तरफ हाहाकार मच रहा था तब सभी देवताओ ने मिलकर एक फैसला किया । उन्होने  माता लष्मी माता काली और माता सरस्वती की आराधना की तब माताओ ने मिलकर एक फैसला लिया उन्होंने अपनी शक्ति से एक कन्या को जनम दिया ।

 तब वह कन्या बोली हे माँ आपको मेरा प्रणाम । आपने मुझे किसलिए बनाया है । तब माँ बोली इस कल्युग में एक शक्ति की जरुरत है । चारो तरफ पाप बढ़ रहा है  । माता बोली एक राजा रत्ना सागर नाम का मनुष्य है।  तुम्हें उन  के घर जाकर जनम लेना है ।  तब कन्या ने माँ की बात का मान रखा ।

 और उस राजा के घर में जनम ले लिया । त्रुक्ता और वैष्णो  उसका नाम रखा गया । राजा के घर में कन्या जन्मे है । राजा बहोत खुश हुआ । राजा ने अपने घर में हवन करवया । और यग भी करये । कभी कभी वह शिकार भी किया करता था । अपने सोक में राजा कई निर्दोष जानवर , पक्षीयो को भी मार डाटा था । यह देख कर कन्या को अपने पिता का शोक अच्छा नहीं लगता था । फ़िर  कन्या ने पिताजी को समझाया की अगर आप किसी को प्राण दे नहीं सकते तो क्यों लेते हो निर्जीवो की जान । अपनी बेटी की बात सुनकर वह बहुत ख़ुश हुआ । और राजा ने यह घोसना करा दी की कोई भी निर्दोसो की जान नहीं लेगा । वैष्णो देवी का उस दिन से ही नाम हो गया ।                 

Vaishno Devi Story । माता वैष्णो देवी की कथा

फ़िर कन्या ने भक्ति  को मन में बसा लिया । फ़िर कन्या बोली अपने माता पिता से की मुझे तप करना है । तप की बात सुन कर माता पिता बहुत ही वयाकुल हो उठे । तब माता पिता बोली बेटी तुम्हरे बिना हम कैसे रह पाएगे । तुम जगल  में कैसे रह पाओगी। बेटी जगल में तुम देख कर नर भकसी  को डर जाओगी।

घबराऔ  नहीं माता तूम मुझे आसिर्वाद दें दो मुझ्रे धरती पर आने का अपना फर्ज याद है ।  माता पिता की आज्ञा  ले कर वन को चलने लगी। और सागर तट पर जाकर तप करने लगी । अन्न जल भी उसने तेयाग दिया और सारे काम भी छोड़ दीये ।   घोर तपस्या करने लगी ले कर प्रभु का राम राम नाम लेने लगी।  जब राम और लक्मण सीता की खोज में सागर तट पर पहोचे । देख कर उस कन्या की भक्ति  को मन में हरसाये  

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हे कन्या तूम क्या  चाहती हो हम को बतलो। बोली वह कन्या हे परभु मुझे अपनी अर्धांगनी  की रूप में अपना लो प्रभु राम बोली इस जनम में तो मेरी पत्नी सीता है । प्रभु राम बोलै हे कन्या तुम्हरा तपस्या बेकार ना हो ।  हम.कलयुग मे कल्कि रूप में अवतार लेगें फ़िर तुम्हे पत्नी के रूप में हम अपनाएगे  तुम्हरी इच्छा पूरी होगी । जब कल्कि रूप में हम आएँगे ।

 तिरुपत पर जाकर जब तक तुम निवाश करो । भक्तो का उदार करो । और दुस्टो का नाश करो।  वहाँ तुम  वैष्णो देवी के नाम से तुम जानी

जाओगी।

प्रभु राम तेरुपता को यह वरदान देते है । वैष्णो देवी माता सबके दुःख हरती है । सर्धा  भाव से जो भी व्यक्ति माँ के दुआर जाता है ।

उसके सारे कष्ट माता हर लेती है।  और अपार ख़ुशी मिलती है। तीनो रूप में माता  यहाँ विराजमान है और जो जग की रखवाली करती है

 । माँ सारदा माँ  लक्मी और महा काली जिन भक्तो को भी माँ पर विस्वास होता है । माँ उनका विश्वाश टूटने नहीं देती है माँ वैष्णो देवी  के भक्तो  की आश लगी रहती है । इस्लिये माँ  वैष्णो देवी दरशन के लिए लक्खो व्यक्ति जाते है ।

आप पढ़ रहे हैं मात वैष्णो देवी की कथा भक्ति वर्षा पर !

कटरा में एक गांव

कटरा से दूर एक हंसली नाम का एक गांव बसा है । वहाँ माता का एक भक्त श्रीधर नाम का रहता था । माता के चरणों में उसने लगन लगा रखी थी । छोटी छोटी कन्याऔ को पूजता और खाना खिलता  । गंगा जल से उनके पैरो को धुलता था । यह बहुत गरीब था । लेकिन सब उसका बहोत सामान करते थे । बस उसको एक ही चिन्ता थी । उसकी कोई संतान नहीं थी। भक्त श्रीधर के मन में एक सवाल आया । मेरी भक्ति में कोई दोष है क्या माँ जो मेरा ख़याल नहीं करती हो । मुझे दरसन क्यों नहीं देती हो । मुझे बताओ में तुम्हरा सच्चा भक्त हु । सर को झुकाकर करता है । विनती श्रीधर ने मन में थान लिया जब तक मुझे दरसन नहीं दोगी तब तक में अन्न और जल नहीं लूगा। और रोज की तरह उसने कन्या पूजन किया जब कन्या के रूप में उसे दरसन हो गए । फिर श्रीधर हाथ जोड़कर कन्या से कुछ पूछना चाहते है । कौन अलौकिकक  शक्ति है ये ।

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माँ का भंडारा

वो ना पहचाने कुछ पूछने से पहले ही बोली माँ हे श्रीधर सारे गांव वालो को बुलवाओ इस कुटीया में और मेरे नाम का भंडरा करियो। जो भी मिल जाये उसे दे देना न्योता भोजन कराने से ज्यादा कोई और पुण्य नहीं है । ,मन ही मन सोचे श्रीधर ये कैसे हो पाएगा । इस छोटी सी कुटिया में ये सारा गांव कैसे आ पाएगा । श्रीधर गरीब होने के कारण चिन्ता  में पड गए। जग जननी माता तुम ही रखना मेरी लाज । कठिन परिक्सा है मेरी मुझको लगता है डर घर घर जाकर वो सबको नेमंत्रेण  दे दिया  ।

भैरो नाथ  का डेरा 

रास्तें में बाबा भैरव नाथ का डेरा  भी था । हाथ जोड़कर बोला श्रीधर कल भंडारा करवाऊंगा सारे गांव के साथ भोजन आप को भी करवाऊंगा  । बोले बाबा भरैव नाथ तुमने ऐसा क्या है पाया फूटी कोड़ी नहीं है तुम्हरे पास कैसे भंडारा कराओगे  । उस कन्या के बारे में श्रीधर ने बताया । बाबा भरैव नाथ को । सुनकर श्रीधर की बात को बाबा अचम्भित  हो गए । गरू गोरख नाथ को  सारी बात बता दी । बोले गोरख नाथ कल देखते है  । कौन है वो कन्या अपने शीयो के साथ  हम कल श्रीधर के घर जाऐगे।देखते है की कल वो हमें कैसे भोजन कराएगा ।

श्रीधर का 56 भोग

बाबा भैरव नाथ अपने गरू और चेलों के साथ श्रीधर के घर आये । बना है 56  भोग को देख गबराये उसकी कुटिया उतनी ही बड़ी हो जाती है । जितने लोग वहाँ आते जाते है । वो देखते है की कन्या सभी को भोजन करा रही है । ये कोई सादारण कन्या नहीं है  ,ये मन ही मन संदेह हुआ बाबा भैरोनाथ को बोले बाबा की अब इसका इम्तेहान लेना पड़ेगा । ये कोई साधरण कन्या हे में नहीं मान सकता  बोले कन्या से भैरव नाथ हमें यह भोजन नहीं है खाना । हमें पीने को मदिरा और खाने को मांस चाहिए । कन्या बोली हे भैरव तुमको नहीं है ज्ञात ये है माता वैष्णो का भंडरा । क्या तुम देख नहीं रहे हो । फिर बाबा उस कन्या का हाथ पकड़ने की कोसिस करते है ।

गर्भ जून की गुफा

फिर कन्या अन्तरधाम हो गयी । अपने आप पर भैरव को अभिमान था [ घमंड ] गर्भ जून की गुफा में जाकर कन्या बैठ गयी । खोज  निकलुगा तुमको भैरव बोल रहा था । गुफा के दुआर पर भैरव को एक साधु ने समझया । लोट जा भैरव वापस वार्ना तेरा कल है आया । क्रोध में होकर भैरव ने उस साधु को धमकाया क्या तूम मुझको नहीं जानते हो । भैरव नाथ है नाम हमारा भैरव नाथ ने उस साधु की कोई बात नहीं मानी। हठ कर के घुस गया गुफा में वो भैरव अभिमानी माता को आभास हुआ फिर माता ने अपना तिरसुल उठया गुफा के अंदर से माता ने एक रास्ता बनाया । कहा गई वो कन्या बाबा भरैव होने लगा बैचेन जब तक भेद नहीं जाँऊगा । मुझे चेन नहीं आयेगा ।

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त्रिकूट  की गुफा                  . 

 त्रिकूट पर्वत की गुफा पर विरजमान थी माँ कहा छुपी है कन्या तेरा पीछा छोड़ू ना । लगुर वीर को पहरे पर माता लगाती है । फिर माता वैष्णो  ने भैरो को युद्ध के लिए ललकारा कहा थे पीछे हटने वाले दिया जवाब करारा । लेकिन जब लागुर वीर पर भैरव पड़ने लगे भारी। क्रोध में भरकर आ गयी माता अस्टभुजादआरी वध करने को माता हो गई मजबूर काट दिया सर भैरव का गिरा वो जाकर दूर । भरैव को अपनी गलती का फिर अहसाह हुआ । किए हुए तप का मेरे नाश हुआ । माता से वनती करके वो अपनी गलती की माफ़ी मांगते है । करुणा से भरी माँ ने भैरव को  माफ़ कर दिया । माँ बोली भरैव तेरा ये तप  ऐसे ही वर्थ नहीं जाएगा  जो भक्त मेरे दरशन के लिए आएगा वो तेरे दर भी आएगा

बाबा भैरव नाथ का दर

पराचीन कल में यह माना जाएगा जो भी भक्त वैष्णो माँ के दरसन   के लिए आएगा । वह तेरे दरसन भी ज़रु करेगा । तेरे दरसन के बिना  माता वैष्णो  का दर्शन अधूरा है इस्लिये जो भी भक्त माता वैष्णो के मंदिर को आते है । वह बाबा भैरो नाथ के मंदिर भी जाते है । और जोर जोर से जयकारा माता का लगते है । माता वैष्णो का धाम बड़ा ही पवन है । सपने में आकर माता ने श्रीधर को दीया वरदान ४  पुत्रो की हो जाये संतान युगो युगो तक पूजा मेरी तेरा वंश ही करेगा  । ना ही रहोगे निर्धन तुम ऐसा भंडार भरेगा। माता वैष्णो के वचनो को सुनकर श्रीधर धन्य हो गया  । सभी इच्छा हो गई पूरी वह धन्य हुए तब से ले कर आज तक श्रीधर वंश ही माता वैष्णो की पूजा अर्चना करता है । वैष्णो धाम के जैशा नहीं है इस दुनिय में और कोई धाम जय माँ वैष्णो देवी 

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2 thoughts on “Vaishno Devi Story । माता वैष्णो देवी की कथा”

  1. Bahot hi Sundar Tarah se bataya hai aapne, aapko namashkar, aise hi gyan ki ganga bahate raho aur sanatani dharm ko failane me yogdan dete rahe.

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